Khadak: जादुई नीले आसमान के नीचे बर्फीले पठारों का गीत

Khadak (2006) को वेनिस फिल्म महोत्सव में लॉयन ऑफ़ फ्यूचर अवार्ड 2006 और टोरंटो फिल्म महोत्सव में कल्चरल इनोवेशन अवार्ड 2007, सनडांस फिल्म महोत्सव में ग्रैंड ज्यूरी अवार्ड से सम्मानित किया गया।

khadak 2006 movie review filmbibo
khadak 2006 movie scene

दो महाशक्तियों के बीच धँसा एक देश। अपने भीतर सबसे बड़े खानाबदोश समूहों को समेटे। चमकीले नीले आकाश के नीचे पठारी सतह पर मरुस्थली और बर्फीली गोलाई लिए हुए इसकी देह। अभी भी इसकी आत्मा पर इतिहास के जाबांज क्रूरतम घुमंतू शासकों की इबारत अंकित है। रहस्य से भरा। हिमयुगीन बर्फीले तुफानों को पछाड़ता खानाबदोशो का देश। यह मंगोलिया है। इसकी आधी आबादी अभी भी खानाबदोश है। खड़क ऐसे ही खानाबदोश परिवार की कहानी है जिसे उनके घुमन्तू जीवन से उठा कर अचानक नये रोजगार और शहरी जीवन के ढाँचे में डाला जा रहा है। यह बेल्जियन फिल्म मंगोलियाई मान्यताओं एवं मिथकों के साथ घुमंतुओं के जीवन को बहुत ही बारीकी से अपनी काव्यात्मक सिनामेटोग्राफी की भाषा में गाती है।

खड़क का अर्थ शैमनिक एवं तिब्बती बौध बैगाओं के आशीर्वाद से अभिमंत्रित दुप्पटे के रूप में किया जाता है।शैमेनिज्म एक तरह का कबीलाई धर्म है, फिल्म का नायक बागि (बत्जुल ख्यानख्यारवा) इसी पंथ को मानने वाला एक मंगोल खानाबदोश पशुपालक है जो अपने दादाऔर माँ के साथ किसी निर्जन पठार में रहता है। उसके पिता एक पायलट थे जो एक विमान दुर्घटना में मारे गये। उसे मिर्गी के दौरे पड़ते है जिसे उसके लोग अतीन्द्रिय शक्तियों से भी जोड़ते है। मिर्गी के दौरे से वह बेहोश हो जाता है, एक शैमेनिक तांत्रिक उसे बचाता है और कहता है कि उसके पूर्वज उसे पुकार रहें है, उसे तांत्रिक बन सिद्धहस्त हो लोगो की सेवा करना चाहिए। बागि इसे पूरी तरह ठुकरा देता है साथ ही शैमेनिक तांत्रिक से किसी प्रकार के प्रशिक्षण लेने को भी इनकार करता है।

khadak movie scene filmbibo
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पशुओं में प्लेग फैलने की वजह से शासन द्वारा सारे पशुधन का सफाया कर उन्हें वहां से हटा दिया जाता है। बागि अपने प्रिय घोड़े पर नीला दुप्पटा बाँध उसे वहीँ छोड़ देता है। उनके परिवार को सोवियत युग के अवशेष धारी उजड़े एक शहर में पुनर्वासित किया जाता है। माँ को कोयला खदान में किसी क्रेननुमा दैत्याकार मशीन चलाने तथा बागि को डाकिये का काम दिया जाता है। उसे मृत पशुओं की आवाजें सुनाई देती है, फिल्म का ध्वनी संकलन कमाल का पाइप से गुजरते पानी की आवाज का भेड़ों के क्रंदन में बदलना फिल्म को रहस्यमय बनाता चलता है। बागि मुलाक़ात झोल्झाय (सेत्सेगी ब्याम्बा) एक कोयला चोर और एक संगीत बैंड कि सदस्य से होती है। वह अपनी आध्यात्मिक यात्रा में एक भविष्य के शहर को देखता है और बदलाव की ओर बढ़ता है। फिल्म अंत तक आते आते अपने सामान्य नरेटिव से हटकर फेंटेसी का तानाबाना बुनने लगाती है। और रहस्यवादी फिल्म में बदल जाती है।

सन 2006  में बनी यह फिल्म मंगोलिया में शूट की गई है। यह आधुनिकीकरण के दौर से गुजरते इस मुल्क, मंगोलियाई खानाबदोश जीवन, आध्यात्मिक, शैमेनिक रहस्यवाद को बहुत ही गहराई से परदे पर उतारती है। उस भूगोल के आदिम सौन्दर्य में जीवन की जद्दोजहद स्तब्ध कर जाती है। फिल्म देखने के बाद एक मर्तबा तो हमारा दिल इस हसीं जमींन पर भटकने के लिए हो ही जाएगा।

फिल्म का बेल्जियन शीर्षकद कलर ऑफ़ वाटरहै। पीटर ब्रोसेन्स एवं जेसिका वूडवर्थ बेल्जियन फिल्मकार है जिन्होंने डॉक्युमेंट्री फिल्मो से अपनी शुरुवात की थी उन्होंने मंगोलिया पर सिटी ऑफ़ स्टेप्प्स,  स्टेट ऑफ़ डॉग्स, पोयट्स ऑफ़ मंगोलिया डॉक्युमेंट्री फिल्मे बनाई है। खड़क उनकी तीन फिल्मों की श्रृंखला की पहली फिल्म है, अन्य दो फिल्में अल्टीप्लानो एवं द फिफ्थ सीजन है जिनके विषय भी प्रकृति, पर्यावरण, लोकजीवन और रहस्यवाद हैं।

khadak poster filmbibo
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सिनेमेटोग्राफर रिमव्यदास लेइपस लिथुवानिया से हैं जिन्होंने अपने कैमरे से अंतहीन बर्फीले पठार, आसमान के जादुई रंग, क्षितिज की रेखा को भेदते अकेले पेड़, पठार को और अधिक पठार बनाती कोयलें खदाने जैसे दृश्यों से फिल्म के भीतर दृश्यों की कविता गढ़ी है।

इसे वेनिस फिल्म महोत्सव में लॉयन ऑफ़ फ्यूचर अवार्ड 2006 , टोरंटो फिल्म महोत्सव में कल्चरल इनोवेशन अवार्ड 2007, सनडांस फिल्म महोत्सव में ग्रैंड ज्यूरी अवार्ड से सम्मानित किया गया है।

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तुषार वाघेला छत्तीसगढ़ के प्रमुख फिल्मकार और विजुअल आर्टिस्ट हैं, उनका जन्म 6 जनवरी 1975 को दुर्ग, छत्तीसगढ़ में हुआ था। उनकी कला के मुख्य विषय-वस्तु ज्यादातर छत्तीसगढ़ राज्य पर ही केन्द्रित होते हैं। अभी हाल ही में तुषार ने ‘द ग्रे’ नामक हिंदी फीचर फिल्म का निर्माण किया है जो छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभाव और पलायन पर आधारित है। वर्तमान में तुषार xray सीरिज में कार्य कर रहें हैं। उनकी पेंटिंग सीरीज़ छत्तीसगढ़ डायरीज में छतीसगढ़ के ग्रामीण एवं शहरी जन-जीवन को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक दृष्टिकोण से वे चित्रित करती है। उनकी फिल्में बहुत ही अलग अलग विषयों पर है जैसे- द होम हमारे घरों में साथ रहने वाले सूक्ष्म जीव – जगत और मनुष्य के आधिपत्य पर, दण्डकारण्य: द जंगल ऑफ पनिशमेंट बस्तर के नक्सल हिंसाग्रस्त क्षेत्र की त्रासदी पर, फैंटम ऑफ़ ए फर्टाइल लैण्ड भू-अधिग्रहण एवं किसानो की व्यथा पर केन्द्रित है, तथा द घोस्ट टेक्सोनोमी भारतीय अर्थव्यवस्था पर आधारित है, वहीँ शैडो ऑफ़ थॉट्स एक चित्रकार एवं लेखक पर केन्द्रित है। प्रिजनर्स ऑफ़ मून दो व्यक्तियों के बिछड़ने की कथा है। उनकी फिल्में 50 से अधिक अन्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों, संग्रहालयों, आर्ट गैलरियों में प्रदर्शित की जा चुकी है