Review: ‘रात अकेली है’ है देखने लायक फ़िल्म है

हनी त्रेहन द्वारा निर्देशत ‘रात अकेली है’ फिल्म शुरू होते ही, क्रेडिट से पहले अगर दो हत्याएं होती दिखें तो यह मानकर चलना चाहिए कि आगे फिल्म की कहानी में इन दो हत्याओं का रिश्ता ज़रूर है. खासकर, फिल्म में अगर नवाजुद्दीन सिद्दिकी हों, तब तो और भी. आप यह भी जान रहे हैं कि नवाज़ भाई, विद्या बालन वाली फिल्म ‘कहानी’ के बाद शायद सिर्फ दूसरी बार पुलिस वाले की भूमिका में हैं. वरना नवाज को तो फिल्में हो या वेब सीरीज, कानून तोड़ने में ही मजा आता है.

सच कहा जाए तो ‘रात अकेली है’ देखने से पहले मैं डरा हुआ था. फिल्म ‘रात अकेली है’ का अधिकतर कास्ट वही है जो कुछ दिन पहले देखी ‘घूमकेतु’ में था. इला अरुण, और स्वानंद किरकिरे भी. पर दोनों फिल्मों का मिजाज एकदम जुदा है. फिर फिल्म शुरू होती है तो अविवाहित नवाज का किरदार स्थापित हो जाता है और उनकी मां का भी. अब इला अरुण की भाषा वही है जो ‘घूमकेतु’ में थी तो यह दोहराव है. पर आपका ध्यान नवाज की तरफ रहता है जिनके चेहरे पर एक भी मांसपेशी एक्टिंक के दौरान, या रिएक्टिंग के दौरान अतिरिक्त नहीं हिलती. एकदम सजग, स्थिर अभिनय.

फिर, मिलती है हत्या की सूचना. रोशनी से जगमगाती एक हवेली में, जहां हत्या हुई है. हवेली में शादी हुई है और हत्या दूल्हे की हुई है. बिस्तर पर पड़ा दूल्हा मरा पड़ा है. और दूल्हा उस घर का बुजुर्ग मालिक है. पर घर के लोग बहुत परेशान नहीं दिख रहे हैं.

अगले एकाध सीन में यह भी स्थापित हो जाता है कि बुजुर्गवार रघुवीर प्रताप सिंह उर्फ दूल्हा उर्फ मृतक बेहद अय्याश किस्म का था. उसने अपनी रखैल (यह शब्द इस्तेमाल करना अच्छा नहीं लग रहा मुझे, पर यह फिल्म में इस्तेमाल किया गया है) राधिका आप्टे से शादी की है और मारा गया है. फिर कानपुर के चौकी इंचार्ज बने जटिल यादव उर्फ नवाजुद्दीन सिद्दिकी की खोज-बीन जारी होती है.

एसएसपी बने तिग्मांशु धूलिया स्थानीय विधायक के पाले में हैं और पहले शॉट से उनका किरदार शक के घेरे में रहता है कि हो न हो यह बंदा हत्यारों के साथ मिला हुआ है. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘मांझी’ और फिर ‘रात अकेली है’…तीनों फिल्में मिलाकर तिग्मांशु धूलिया को देखिए तो बतौर एक्टर उनके पास बहुत सीमित हाव-भाव हैं, पर उन सीमित हाव-भावों के साथ ही वह अपना किरदार खींच ले जाते हैं. दोहराव भले हो, पर यहां भी उनका किरदार कहीं से लाउड नहीं लगता. फिल्म में कहानी के साथ-साथ किरदार आते हैं, खुलते हैं और फिर उनका सिरा खुला छोड़कर कहानी आगे बढ़ जाती है.

एक पुलिस अफसर के रूप में नवाजुद्दीन सिद्दिकी के किरदार में वह सब कमजोरियां हैं, जो एक सामान्य इंसान में हो सकती हैं. जटिल यादव सिंघम नहीं है, न हा विजय श्रीवास्तव. हां, अगर आपको वेब सीरीज ‘पाताललोक’ के जयदीप अहलावत का किरदार याद हो, तो उससे जटिल यादव (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) की समानता हो सकती है.

‘पाताल लोक’ और ‘रात अकेली है’ में एक बड़ा अंतर है कि ‘पाताल लोक’ का अंत बेढब था, ‘रात अकेली है’ का अंत कसा हुआ है. रात अकेली है में कई छोटे किरदार हैं जो अपने फिल्म होने के औचित्य के साथ न्याय करते हैं. यहां तक कि अपने ड्राइवर बेटे (जिसकी फिल्म के शुरू में हत्या हो जाती है) के गम में पागल बूढ़ी औरत तक… फिल्म का सेट अप और कालखंड बहुत शानदार है.

कहानी को कहीं भी अनावश्यक तूल नहीं दिया गया है. संपादन शानदार है और निर्देशन चुस्त. स्वानंद किरकिरे छोटे किरदार में है, पर उनकी देहभाषा गजब की दिखी है. सिनेमैटोग्राफी में कसर नहीं है और कैमरा बहुत बारीक चीजें पकड़ता है. फिल्म में जबरिया गाना नहीं ठूंसा गया है. इला अरूण के किरदार की भाषा वही है, जो उन पर बहुत फबता है और जिसे आप परदे पर बहुत सारी फिल्मों में देख चुके हैं. राधिका आप्टे और नवाज की केमिस्ट्री हम बहुत सारी फिल्मों और वेबसीरीज में देख चुके हैं. और यहां भी दोनों की नियंत्रित देहभाषा बहुत सहज है. खासकर ट्रेन के दरवाजे पर खड़े नवाज और राधिका आप्टे के दृश्य बिना दैहिक नैकट्य के अद्भुत रोमांस परोसते हैं. कुल मिलाकर ‘रात अकेली है’ देखने लायक फिल्म है.