मैथिली सिनेमाः क्या थी ममता गाबय गीत की कहानी

ममता गाबय गीत मैथिली की फिल्म थी जिसमें मैथिली की मिठास के साथ एक शानदार कथा रची गई थी

ममता गाबय गीत में सुखिया के किरदार में अज़रा
ममता गाबय गीत में सुखिया के किरदार में अज़रा

‛देवकी परोछे गेली, यशोदा बेकल भेली, आहो रामा… हम्मर कन्हैया घुरियो ना आवत रे की..’ वैदेही ठाकुर और रेखा झा के गाये इस ममतामयी गीत(लगनी) से फिल्म की कहानी को आप समझ सकते हैं ।

फिल्म की शुरुआत इस मैथिली संवाद से होता है जिसमें नन्दा कहता है कि “बड़की मलकैन मैर गेलखिन” अन्य लोग शोकाकुल होकर कहते हैं …“ओहो लछमी नै रहली..!”

फिल्म की कहानी राजनगर के निकट किसी गांव के जमींदार (ठाकुर) घर की है. कहानी की शुरुआत में ही प्रसवकाल के दौरान ठाकुर की पत्नी यानी ठकुराइन की मृत्यु हो जाती है लेकिन बच्चा बच जाता है।

घर में ठाकुर की विधवा भाभी होती है लेकिन बच्चे का पालन-पोषण ठकुराइन की सेवा करने वाली सुखिया (नौकारानी) करती है। ठाकुर के बेटे का नाम बौआ रखा जाता है।

सुखिया को एक बेटा गहनु और भतीजी शनिचरी थी लेकिन वह बौआ के पालन-पोषण में इस तरह मग्न हो जाती है कि उसे अपने बच्चे की सुधि ही नहीं रहती।

ठाकुर पुराने जमींदार थे जिस वजह से घर – आंगन में खेती व अन्य कामों के लिए  नौकर, चाकर, लाला रहा करते थे। सुखिया का पति नंदा ठाकुर के यहां चाकरी करता था, उसके खेत-खलिहान को देखता था।

जमींदार(ठाकुर) के  किरदार में उदयभानु ठाकुर
जमींदार(ठाकुर) के किरदार में उदयभानु ठाकुर

ठाकुर की भाभी का कठोर अनुशासन और एकक्षत्र राज था इसलिए समूचे व्यवस्था का संचालन उसी के आदेश से होता था।

बौआ का मुंडन संस्कार होता है, उस वक्त वह सुखिया की गोद में था, ठाकुर सुखिया को इस मौके पर गले का हार उपहार स्वरूप देते हैं। मुंडन के दिन ही सुखिया के बेटे गहनु की मृत्यु का समाचार आता है, इसे जानकर समूचे गांव में हाहाकार मच जाता है लेकिन सुखिया पर किसी तरह का कोई असर नहीं होता।

बौआ बड़ा हो जाता है और उसे बाहर पढ़ने भेज दिया जाता है। सुखिया इस विरह से बहुत आहत होती है।

कहानी में ठाकुर का हावभाव ऐसा दिखता है जैसे वह नौकारानी सुखिया के प्रति झुकाव रखता है, मुंडन के समय गले का हार उपहार में देने पर लोगों की शंका और बढ़ जाती है। खासकर ठाकुर की भाभी सुखिया के साथ ठाकुर के रिश्ते पर शक भी करती है।

फिल्म में जब ठाकुर बौआ को सुखिया की गोद में रखते हैं तब उसकी नजरों में सुखिया के प्रति स्नेह दिखाया जाता है इसे देखकर भाभी रामचरितमानस की चौपाई ‛थके नारि नर प्रेम पिआसे..रमा हो रमा….रमा हो रमा.’ गुनगुनाकर तंज कसती है ।

सुखिया की खूबसूरती पर ठाकुर के लाला की भी नजर रहती है और वह ठाकुर की भाभी को उसके खिलाफ भड़काता रहता है। बौआ जब पढ़ाई के लिए शहर चला जाता है तो सुखिया का ठाकुर के घर आना बंद हो जाता है।

लाला सुखिया को अपने जाल में फांसने की कोशिशें करता है लेकिन वह सफल नहीं हो पाता जिसके बाद वह सुखिया को बहुत सताता है, काफी दुखों को झेलने के बाद सुखिया की मृत्यु हो जाती है।

लाला और ठाकुर की भाभी को इस कहानी का विलेन कहा जा सकता है।

लाला का किरदार निभाने वाले कमलनाथ ठाकुर (फाइल फोटो)
लाला का किरदार निभाने वाले कमलनाथ ठाकुर (फाइल फोटो)

उसी समय ही बौआ अपनी पढ़ाई पूरी कर वापस गांव आता है तब पता चलता है कि उसे पालने वाली सुखिया की मृत्यु हो गयी है तो झट से वहां पहुंचकर सुखिया की अंतिम यात्रा में पुत्र का फर्ज निभाता है और अपने हाथों अंत्येष्टि करता है।

फिल्म के क्लाइमेक्स में सुखिया की चिता जल रही होती है और बौआ रो रहा होता है. नेपथ्य से सुखिया के भाव को गीत के इन पंक्तियों  से प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया ‛फूटल करम हमर अछि तैइयो ममता गाबय गीत, दूधे भीजत आँचर सदिखन, ई दुनिया के रीत, बहतै हरदम नोर इंहोर, रहतै खाली जिनगी मोर….’।

फिल्म यहीं खत्म हो जाती है।

कहानी में बौआ की प्रेमिका सुखिया की भतीजी शनिचरी होती है। उस दौर में जमींदारों द्वारा  मजदूर वर्ग के साथ क्या शोषण किया जाता था, इसे सुखिया के पति नंदा के माध्यम से फिल्म में दिखाया गया।

फिल्म में दूसरी समांतर कहानी भी चलती है जिसमें ठाकुर की बहन को दिखाया जाता है जो अपने ससुराल मिथिलापुरी में रहती है, ठाकुर और उसके बहन का एकदूसरे के घर आना जाना नहीं होता है। उसके बेटे की शादी होती है, इसी शादी के दौरान फिल्म में मुजरा ‛गोर इजोरिया पर तारा के तिलबा…’ दिखाया जाता है ।  हालांकि दूल्हे को लड़की पसन्द नहीं आती है तो वह छोड़ चला जाता है।