मैथिली सिनेमाः सस्ता जिनगी महग सेनुर मैथिली की पहली ब्लॉकबस्टर थी

सस्ता जिनगी महग सेनुर मैथिली सिनेमा की पहली ब्लॉकबस्टर थी

सस्ता जिनगी महग सेनुर मैथिली की कारोबारी लिहाज से सुपरहिट फिल्म थी
सस्ता जिनगी महग सेनुर मैथिली की कारोबारी लिहाज से सुपरहिट फिल्म थी

मैथिली की पहली फिल्म ‛ममता गाबय गीत’ की शूटिंग राजनगर में हो रही थी, जिसे देखने 11 साल का एक लड़का भी पहुंचा था. फिल्म की अभिनेत्री अज़रा बेहद खूबसूरत थीं, जिसे देखने शूटिंग के दौरान जबरदस्त भीड़ लग जाती थी. भीड़ को चीरता हुआ वह किशोर अभिनेत्री को नजदीक से देखना चाहता था लेकिन उसे भगा दिया  गया.

आगे चलकर यही लड़का एक कहानी लिखता है, निर्देशन करता है, डायलॉग लिखता है, गीत लिखता है, इनमें कुछ गीतों को स्वर देता है और फिल्म में अभिनय भी करता है. फिल्म है ‛सस्ता जिनगी महग सेनुर’ और उस लड़के का नाम है मुरलीधर।

मैथिली फिल्मों के सफल निर्देशकों में गिने जाने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी नेपाल के मैथिलीभाषी मुरलीधर की फिल्म ‛सस्ता जिनगी महग सेनुर’ ने यह साबित किया कि कहानी अगर अच्छी हो तो बिहार में क्षेत्रीय व भाषाई फिल्में भी सफल हो सकती हैं।

1999 में बनी इस फिल्म की सफलता ने मैथिली के साथ-साथ भोजपुरी फिल्मकारों, कलाकारों और सिनेमा से जुड़े लोगों के हौसले को बढ़ाया।

दहेज-उत्पीड़न पर बनी इस फिल्म में मुख्य अभिनेता ललितेश झा, स्वाति परमार, राजीव सिंह थे जबकि मुरलीधर, मोना, विनीत कुमार झा ,बालकृष्ण झा, ललन सिंह, सुरेश आनंद, मार्शा, आभा, प्रेमलता मिश्र अहम भूमिका में थे।

फिल्म में कुल आठ गीत थे जिसे शशिकांत चौधरी, अभिराज और मुरलीधर ने लिखा था। फिल्म के सभी गीत टुन स्टूडियो मुम्बई में रिकॉर्ड हुए थे. संगीतकार मुरलीधर थे। पार्श्व गायक उदित नारायण झा, दीपा नारायण झा, मोहम्मद अजीज, साधना सरगम, मुरलीधर ने फिल्म के आठ गीतों को स्वरबद्ध किया।

‛कनि हंसियौ नै सजनी गुलाब कहै येय’ को पार्श्व गायक उदित नारायण झा, दीपा नारायण झा ने गाया। ‛गे छौरी नाच नाच’ को मोहम्मद अजीज और दीपा नारायण झा, ‛मुर्गा कहै छै कूँक रु कूं को दीपा नारायण झा, ‛तीर चला क नैना कोर सं’ को साधना सरगम, ‛सस्ता जिनगी महग सेनुर’ और ‛पछिया उड़ाक ले गेलै बुच्ची सिमर के रुइया’ को मुरलीधर ने आवाज दी।

होली के एक गीत ‛चटकदार चोली चुनर रंग लाल’ को ललितेश झा, राजेश झा, सुरेश आनन्द और मुरलीधर ने मिलकर गाया था। रोचक बात यह है कि ‛चटकदार चोली चुनर रंग लाल’ की शूटिंग होली के दिन निर्माता बालकृष्ण झा के गांव बलिया (मधुबनी) में हुई थी।

फिल्म निर्माता बालकृष्ण झा बताते हैं, “फिल्म की कहानी तत्कालीन सामाजिक कुव्यवस्था के इर्द-गिर्द थी, निर्देशक मुरलीधर चाहते थे कि गाने की शूटिंग ऐसी हो ताकि सीन में मौलिकता दिखे, इसके लिए हमने अपने गांव बलिया को चुना। गांव के लोगों ने भरपूर सहयोग भी किया और इस गीत की शूटिंग के दौरान सभी लोगों ने खूब एन्जॉय किया। दर्शकों ने भी फिल्म को सराहा। उस दौर में क्षेत्रीय भाषाओं में बनी कम फिल्में थी जो बिहार के सिनेमाघरों में सौ-सौ दिन चली हो, ‛सस्ता जिनगी महग सेनुर’ की सफलता ने मैथिली सिनेमा को बहुत प्रोत्साहित किया।”

फिल्म में कृष्णकांत(कृष्णा) का किरदार भोजपुरी, मैथिली और गुजराती फिल्मों के बड़े अभिनेता ललितेश झा ने निभाया था जबकि कृष्णा की प्रेमिका राधा की भूमिका मध्य प्रदेश की स्वाति परमार ने निभाई थी. ये वही स्वाति हैं जिन्होंने मशहूर टीवी सीरियल ‛कुमकुम भाग्य’ में मिताली भाभी और ‛नागिन’ में मानसी का रोल निभाया.

विलेन गजराज की भूमिका में राजीव सिंह थे, इस फिल्म में उनके किरदार ने ऐसी छाप छोड़ी की आज भी मैथिली और भोजपुरी सिनेमाप्रेमी उन्हें ‛गजराज’ ही पुकारते हैं।

कृष्णा की बहन चंदा का किरदार मोना ने निभाया जबकि पण्डित नागेन्द्रनाथ का रोल लल्लन सिंह ने किया था। अमरनाथ की भूमिका मुरलीधर ने निभाया जबकि संटू के किरदार में रोमी ठाकुर थे वही मार्शा संटू की प्रेमिका टुनिया के किरदार में थी।

निर्माता बालकृष्ण झा ने बलदेव का रोल निभाया, बलदेव की पत्नी ‛सरसों वाली’ का किरदार अनुराधा और उनकी मां की भूमिका रूबी अरुण ने निभाया था।

छोटी भूमिका में विनीत झा ने शैतान सिंह, सुरेश आनन्द ने रंकुलाल, प्रेमलता मिश्र ने गजराज की मां, कल्पना झा ने राधा की काकी, बसंत कुमार ने राधा के काका, बिंदी चौधरी ने टुनिया के पापा की भूमिका में थे।

फिल्म के निर्देशक मुरलीधर बताते हैं, “फिल्म अभिनेता ललितेश झा ने मेरी मुलाकात बालकृष्ण झा से करवाई. उन्होंने मैथिली सिनेमा बनाने का सुझाव दिया, सुझाव हमसब को पसन्द आया.”

लेकिन असली मुसीबत निवेश की थी. पार्टनरशिप के तहत 51% बी.के. झा और 49% निवेश पर मुरलीधर की सहमति बनी। मुरलीधर कहते हैं, “बालकृष्ण झा का बहुत बड़ा योगदान है, वह फिल्म निर्माण में रीढ़ की हड्डी थे, उनके बिना 17-18 साल बाद मैथिली फिल्म बनना असंभव था। फिल्म के मुख्य अभिनेता ललितेश झा ने भी सिनेमा बनाने में महत्वपूर्ण सहयोग दिया था। फिल्म से जुड़े लोगों के अलावा शूटिंग के दौरान नेहरा गांव के मैथिलों का सहयोग अविस्मरणीय रहा।”

बहरहला, सबके सहयोग से ‛सस्ता जिनगी महग सेनुर’ फिल्म बनी और सफल रही। मुरलीधर कहते हैं, “फिल्म हिट होने के पीछे स्क्रिप्ट का अहम योगदान था, चूंकि कहानी दहेज और महिला उत्पीड़न पर आधारित थी इसलिए दर्शकों ने कहानी और फिल्म के किरदारो से भावनात्मक जुड़ाव महसूस किया।”

दहेज मिथिलांचल समेत समूचे बिहार में एक वीभत्स रूप ले चुका था, हर रोज विवाहिता की हत्या की खबरें आती थी। मुरलीधर याद करते हैं, “हमने इस कुरीति के खिलाफ लोगों को जगाने के लिए ऐसी कहानी का चयन किया। कहानी आसपास की घटित कई घटनाओं का संकलन था जिसे मैं 1980 से लिख रहा था।”

फिल्म की कहानी विवाह परंपरा पर भी चोट करती है जहां घर के लोग और अगुआ (मीडिएटर) ही तय कर देता है कि लड़का अच्छा है या नहीं।

फिल्म में कृष्णकांत की बहन चंदा की शादी भ्रष्ट पण्डित नागेन्द्रनाथ के कहने पर कहानी के विलेन गजराज से कर दी जाती है जो कि एक नम्बर का नशेड़ी और चरित्रहीन होता है। हालांकि कृष्णकांत उर्फ कृष्णा को इससे एतराज रहता है लेकिन उसकी एक भी सुनी नहीं जाती है।

चंदा मैथिली परंपरा की लड़की होती है जिसे अपने पति पर शक नहीं होता है और उस पर खूब विश्वास करती है लेकिन गजराज बार-बार उसे नैहर (मायका) से किसी ना किसी बहाने पैसा लाने को कहता है। चंदा अपने मायके से बार-बार पैसे ले जाती है।

वर्षों बाद जब गजराज को लगता है कि अब चंदा के नैहर (मायका) से पैसे नहीं मिल सकेंगे तो उसकी हत्या कर देता है।

फिल्म में समानांतर एक अन्य कहानी चलती है जिसमें कृष्णकांत और गांव के गरीब घर की लड़की राधा के बीच प्रेम है लेकिन परिवार वालों की इच्छा के कारण कृष्णकांत और राधा विवाह नहीं कर पाते हैं इधर पण्डित नागेन्द्रनाथ के सहयोग से राधा के काका-काकी किसी अन्य से उसकी शादी तय कर देते हैं।

शादी के दिन बारात आती है लेकिन दहेज के पैसे पूरे नहीं होने पर शादी रुक जाती है। बारात वापस होने पर बिन मां-बाप की राधा को अपने नसीब पर दुख होता है और वह आत्महत्या करने चली जाती है हालांकि राधा को नदी में छलांग लगाते कृष्णा देख लेता है और उसे बचा लेता है।

इतने में गांव वालों की भीड़ लग जाती है और कृष्णा को तरह-तरह के उलाहना देने लगते हैं। कृष्णा गांव वालों के सामने ही राधा से विवाह कर लेता है। इस विवाह को कृष्णा की मां स्वीकार नहीं करती और नवविवाहित जोड़े को घर आने से रोक देती है। कृष्णा राधा के साथ रहने लगता है और थोड़े दिन में ही उसे पुलिस की नौकरी लग जाती है।

कहानी में अमरनाथ होता है, गजराज ने अमरनाथ की बहन रश्मि का बलात्कार किया जिससे आहत होकर रश्मि ने आग लगाकर कर आत्महत्या कर ली। अमरनाथ दहेज विरोधी स्वभाव का होता है। दहेज मांग करने वाले की हत्या कर देता है जिस वजह से कारावास भी जाना पड़ता है।

फिल्म के मुख्य नायक ललितेश झा बताते हैं कि इससे पहले मैं ममता गाबय गीत में मैंने काम किया था, उसके बाद भोजपुरी सहित कई भाषाओं में मैं काम कर रहा था। इसी दौरान मुरलीधर जी से मेरी मुलाकात हुई, उन्होंने एक कहानी सुनाई. स्क्रिप्ट मुझे अच्छी लगी. संयोग से उनकी मुलाकात बालकृष्ण झा से मैंने ही करवाई फिर एक अच्छी फिल्म बनी जिसने मैथिली सिनेमा को प्रोत्साहित किया ।

फिल्म की शूटिंग के दौरान एक घटना को याद करते हुए ललितेश बताते हैं कि फिल्म में होली के गाने की शूटिंग के दौरान मेरे पैर में मोच आ गयी लेकिन मैंने शूटिंग जारी रखा। पैर में सूजन होने पर गर्म पानी से सेंक लेकर फाइट सीन शूट करता रहा। फिल्म शूटिंग की सबसे अच्छी यादों में नेहरा गांव के आदमी हैं जिन्होंने काफी सहयोग किया।

गजराज की भूमिका निभाने वाले अभिनेता राजीव सिंह बताते हैं कि दहेज की प्रताड़ना हमारी बहन, बेटियां झेल रही थी, उस सच्चाई को हमने अपने समाज में करीब से देखा था, गजराज के बहाने दहेज लोभी दैत्यों से समाज को रूबरू कराने का प्रयास किया गया. हमें खुशी है दर्शकों ने फिल्म को भरपूर प्यार दिया ।

मैथिली फिल्म समीक्षक किसलय कृष्णा बताते हैं कि निर्देशक मुरलीधर ने कहानी में आम मैथिलों का नब्ज पकड़ा. सिंटूआ का किरदार हो अथवा नागेन्द्रनाथ का किरदार हो, ये समाज के मौलिक चरित्र थे। दहेज उत्पीड़न की कहानी से दर्शकों ने भावनात्मक जुड़ाव महसूस किया वहीं मिथिला के परंपरागत प्रेमप्रसंग को राधा – कृष्णकांत की प्रेम का रूप देकर पर्दे पर सफलतापूर्वक उतारा, ठेठ संवादों का प्रयोग किया, गीत संगीत भी बेहतर था जिसे दर्शकों ने पसन्द किया।

सस्ता जिनगी महग सेनुर को मैथिलीभाषी दर्शकों ने भरपूर स्नेह दिया. इसकी सफलता से उत्साहित होकर आऊ पिया हमर नगरी, सपना भेल सुहाग, सिनुरक लाज सहित कई मैथिली फिल्में बननी शुरू हो गयी हालांकि इस फिल्म जैसी सफलता आजतक दोहराई नहीं जा सकी है।

अभिनय की बात करे तो रोमी ठाकुर पूरी फिल्म में सहज लगे, मुरलीधर ने अपनी एक्टिंग से सबको प्रभावित किया। विलेन गजराज के किरदार को राजीव सिंह ने जीवंतता प्रदान की। फिल्म के मुख्य नायक ललितेश झा कम उम्र की स्वाति के ऑपोजिट बेमेल लग रहे थे । एक पंक्ति में कहे तो ‛सस्ता जिनगी महग सेनुर’ में कहानी के अलावा ऐसा कुछ नहीं था जिसे याद रखा जाए लेकिन 20 वर्षों से अपनी भाषा की फिल्मों के भूखे-प्यासे मैथिली सिनेमा प्रेमियों ने भरपूर स्नेह दिया।