दिल बेचारा रिव्यू : तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई…

Dil Bechara Movie Review: सुशांत सिंह राजपूत के निधन के बाद रिलीज हुई उनकी आखिरी फिल्म 'दिल बेचारा' को देखकर गुरु दत्त की आत्महत्या के बाद लिखी कैफ़ी आज़मी के शेर याद आने लगे। कैफ़ी ने लिखा था, "इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी / यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई"

dil bechara sushant singh rajput
'दिल बेचारा' सुशांत सिंह राजपूत की आख़िरी फ़िल्म है। संजना सांघी और डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा की डेब्यू फ़िल्म है।

सुशांत सिंह राजपूत की आख़िरी फ़िल्म ‘दिल बेचारा’ शुक्रवार (24 जुलाई) को डिज़्नी-हॉटस्टार पर रिलीज हो गयी। सच पूछिए तो याद ही नहीं कि आख़िरी बार किस फ़िल्म की रिलीज का मैंने इस बेसब्री से इंतजार किया था। सुशांत सिंह राजपूत ने 14 जून को अपने मुंबई स्थित फ्लैट पर आत्महत्या कर ली थी।

‘दिल बेचारा’ कहानी है किज़्ज़ी (संजना सांघी) और मैनी (सुशांत सिंह राजपूत) की। दोनों को जानलेवा कैंसर है। किज़्ज़ी के ज़हन पर उसकी बीमारी इस कदर हावी है कि वो अपनी मौजूदा जिन्दगी को भी बोझ की तरह देखती है। इसी बीच उसकी मुलाकात मैनी से होती है जो अपनी ज़िन्दगी का हर पल भरपूर जीने वाला इंसान है। मैनी शुरू में किज़्ज़ी को इरीटेटिंग लगता है। जब किज़्ज़ी को पता चलता है कि मैनी भी कैंसर  पेंशेट है तो मैनी को लेकर उसका नज़रिया बदलने लगता है।

मैनी और उसका कैंसर पेशेंट दोस्त जेपी एक भोजपुरी फ़िल्म बनाना चाहते हैं। मैनी रजनीकांत फ़ैन है। दोनों को हिरोइन की तलाश है। किज़्ज़ी की एक हाँ के साथ ही दोनों को अपने फ़िल्म की नायिका मिल जाती है। इसके बाद क्या होता है यह जानने के लिए आपको फ़िल्म देखना पड़ेगा।

‘दिल बेचारा’ का संदेश ‘ख़ुश रहना सीखें’

Sushant Singh Rajput
‘दिल बेचारा’ एक्टर सुशांत सिंह की आखिरी फ़िल्म है।

‘दिल बेचारा’ का वनलाइन मैसेज है कि जीवन में जो मिला है, जितना मिला है उसे जीने की कोशिश करनी चाहिए। इसे नियति का खेल ही समझना चाहिए कि अपनी आख़िरी फ़िल्म में सुशांत ने मैसेज दिया है कि जाने वाले के अफ़सोस में जो रह गये हैं उन्हें जीना नहीं छोड़ देना चाहिए। ‘दिल बेचारा’ नियति का खेल है। फ़िल्म की कहानी और सुशांत की ज़िंदगानी एक बिन्दु पर आकर मिले हैं। सुशांत के चाहने वालों के लिए यह फ़िल्म हमेशा ‘स्पेशल रहेगी.’

मेरे जीवन का यह पहला अनुभव है जब किसी फ़िल्म किसी सेंटिमेंटल रीज़न की वजह से देखा। फ़िल्म का डायरेक्शन, कैमरा वर्क, एडिटिंग, गीत, संगीत और बैकग्राउण्ड साउण्ड इत्यादि का मीन-मेख निकलाने का न मौक़ा है और न मूड। इतना जरूर कहना चाहेंगे कि डायरेक्टर मुकेश छाबरा की फ़िल्म बहुत ही नाज़ुक बात कहने की कोशिश करती है। इसलिए इससे सो काल्ड एंटरटेनमेंट की उम्मीद न करें।

मुकेश छाबरा ने अपने डेब्यू के लिए बहुत ही मानीखेज और नाजुक थीम चुनी है जिसके लिए वो बधायी के पात्र हैं। दर्शक भी सुशांत सिंह राजपूत की ‘दिल बेचारा’ को देखकर निराश नहीं होंगे। मुकेश छाबरा की यह फ़िल्म आपको ऋषिकेष मुखर्जी की आनन्द और शूजित सरकार की अक्टूबर की याद दिला सकती है।

‘दिल बेचारा’ देखने के बाद गुरु दत्त की आत्महत्या के बाद लिखी कैफ़ी आज़मी की नज़्म बार-बार मेरे ज़हन से टकराने लगी, शायद आप भी सुशांत सिंंह राजपूत से वही कहना चाहें जो कैफ़ी ने गुरु दत्त से कहना चाहा,

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुन्दर
राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई

इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी
यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई

माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे
बे-रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोई

साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा
अब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई

हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना
क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई

अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के
नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई