वेब सीरीजः ब्रीद इ टू द शैडो में अभिषेक बच्चन के साथ ही इसकी कहानी ने भी निराश किया है

वेबसीरीज ब्रीद की कहानी और अभिषेक बच्चन दोनों ने चरस बो दिया है

ब्रीद में अभिषेक बच्चन ने निराश किया है
breath into the shadow में अभिषेक बच्चन और नित्या मेनन मुख्य भूमिका में हैं।

Breathe: into the shadow (ब्रीद : इन टू द शैडो) अमेज़न प्राइम पर हाल ही में रिलीज़ हुई एक टीवी सीरीज है। इसके जरिए अभिषेक बच्चन और साउथ के फिल्मों में अपनी पहचान बना चुकी नित्या मेनन ने ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अपनी एंट्री दर्ज कराई है।

कहानी क्या है

यह एक साइको थ्रिलर कहानी है जिसमें अभिषेक बच्चन ने अविनाश सभरवाल और नित्या मेनन ने अभिषेक बच्चन की पत्नी आभा सभरवाल का किरदार निभाया है।

अविनाश और आभा की एक बेटी है सिया सभरवाल, जिसका किडनैप हो जाता है और दोनों अपनी बेटी को खोजने के जद्दोजहद में लगे रहते हैं। स्वाभाविक है जब किडनैप हुआ है तो एक पुलिसिया कैरेक्टर भी होगा जिसे निभाया है अमित साध ने।

अमित साध क्राइम ब्रांच के पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका में हैं और वेब सीरीज में उनका नाम कबीर सावंत है। सब मिलकर सिया की खोज में लगे रहते हैं और कहानी आगे बढ़ती है। साथ ही बैकग्राउंड में कुछ कत्ल हो रहे होते हैं। कत्ल क्यों हो रहे होते हैं? क्योंकि अविनाश अग्रवाल के पास एक चिट्ठी आती है जिसमें उनसे कहा जाता है कि अगर वह अपनी बेटी को जिंदा वापस चाहते हैं तो यह कत्ल करना पड़ेगा।

अविनाश अपनी पत्नी आभा के साथ मिलकर कत्ल को अंजाम दे रहे होते हैं। कुछ एपिसोड बाद यह मालूम पड़ जाता है कि अविनाश ने ही अपनी बेटी का किडनैप किया है और वह खुद को चिट्ठी लिखकर कत्ल करने के लिए कहते हैं।

इससे यह साफ हो जाता है कि अविनाश को ड्यूल पर्सनालिटी डिसऑर्डर भी है यानी वो एक साथ दो जिंदगी जी रहे होते हैं। इसके बाद सीरीज में आगे यहां से उठे कुछ सवालों का जवाब मिलता है। जैसे कि –
1. क्या अविनाश सबरवाल को उसकी बेटी वापस मिलती है?
2. क्या आभा को मालूम पड़ेगा कि उसकी बेटी का किडनैपर उसका पति अविनाश है?
3. क्या पुलिस पता लगा पाती है कि अविनाश दरअसल दो जिंदगी जी रहा है और वही सिया का किडनैपर है?
4. आखिर अविनाश में डुएल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कहां से आता है और इसका उसके पास्ट से क्या रिश्ता है?
5. और वह जिन लोगों का कत्ल कर रहा होता है वो लोग कौन हैं और इस कत्ल के पीछे का कारण क्या है?

क्या अभिषेक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर कमाल कर पाए हैं?

असल जिंदगी में लगभग सभी लोगों का कुछ ना कुछ टोटका होता है। जैसे कि हम इंटरव्यू में वो कपड़े पहनते जो पास्ट में कभी हमारे लिए लकी हुआ होता है।

अभिषेक बच्चन के फिल्मी करियर पर अगर हम एक सरसरी निगाह डालें तो हमें गिनती की कुछ फिल्में मिलेंगी जिनमें उनके किरदार को खूब सराहा गया है। उन्हीं में से एक है गुरु।

उन्होंने शायद ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उस चीज को फिर से जीना चाहा है ताकि बहुत दिनों के बाद वह सफलता का कोई स्वाद चख सकें। इस TV सीरीज में अभिषेक बच्चन ने एक बार फिर से “गुरु” जैसा बनने की कोशिश की है लेकिन अफसोस कि वह “चेला” भी नहीं बन पाए हैं।

अगर अभिषेक बच्चन के ऑपोजिट नित्या मेनन नहीं होती तो उनका कैरेक्टर और एक्टिंग भी थका देने वाला लगता। कई बार तो आप टीवी बस इसलिए बंद नहीं करते क्योंकि फ्रेम में अभिषेक के साथ नित्या मेनन यानी आभा दिख रही होती हैं और वह अपने एक्टिंग स्किल से उस सीन में जान फूंक रही होती हैं।

अविनाश और आभा की बेटी सियाबने अपना किरदार बखूबी निभाया है और पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में अमित साध यानी कबीर सावंत भी अच्छे दिखे हैं।

आभा के बाद अगर कोई दूसरा कैरेक्टर फिल्म में सबसे ज्यादा स्ट्रांग है तो वह है मेघना वर्मा का जिसे निभाया है पलबिता ने। व्हीलचेयर पर होने के बावजूद मेघना बाकी किरदारों के मुकाबले एक्टिंग की पिच पर सबसे तेज दौड़ रही होती हैं।

साउंड या डबिंग कैसी है?

टीवी सीरीज में साउंड की क्वालिटी कई जगह पर बेहद ही दोयम दर्जे की है। शुद्ध देसी भाषा में कहें तो एकदम घटिया।

अभिषेक बच्चन और अमित साध मानो मुँह में गुटखा रख कर बोल रहे होते हैं। सब जगह नहीं लेकिन बेहतरीन ट्विस्ट और टर्न्स पर जरूर।

कई जगह पर आवाज की क्वालिटी इतनी घटिया है कि आप टीवी, मोबाइल या लैपटॉप के स्पीकर में कान घुसा देंगे फिर भी यह नहीं सुन पाएंगे की कैरेक्टर आखिर बोल क्या रहा है? खासकर अभिषेक बच्चन ने इस मामले में चरस बो दिया है।

उनकी आवाज में भी गुरु फिल्म की झलक दिखी है और वह वैसे ही बोलने की कोशिश कर रहे हैं। होठों को बाहर निकाल टेढ़ा कर।

शायद वो यहां भूल गए हैं कि यह ओटीटी प्लेटफॉर्म है जिसके दर्शक बड़े पर्दों के दर्शकों से काफी अलग होते हैं। उनका स्वाद अलग है और वह अलग तरह की चीजों को पसंद करते हैं। अलग मतलब अलग।

बोझिल और धीरे लगने वाली कहानी

शुरुआत के 3 से 4 एपिसोड काफी अच्छे हैं। उसे काफी अच्छे से डायरेक्ट किया गया है और कहानी हर वक्त ट्विस्ट ले रही होती है। लेकिन जैसे ही यह मालूम पड़ता है कि अविनाश ने ही अपनी बेटी का किडनैप किया है, उसके बाद कहानी बोझिल, उबाऊ और थकी हुई लगने लगती है।

ओटीटी पसंद करने वाले लोगों को हमेशा से ही तेज और अनप्रिडिक्टेबल लगने वाली कहानियां अच्छी लगी है और यही इसे TV और बड़े परदे से अलग बनाती है।

यहां डायरेक्टर को यह समझना चाहिए कि सिर्फ किसी चीज में साइको और डुएल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का छौंक मार देने से वह स्वादिष्ट और रोचक नहीं बन जाती।

12 एपिसोड की इस सीरीज में अगर तीसरे या चौथे एपिसोड के बाद सीधे अंतिम एपिसोड भी आप देख लें तो यकीन मानिए कहानी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। आप सब समझ जाएंगे। पूरी की पूरी कहानी मिना कुछ मिस किए। अब आप अंदाजा लगाइए कि बीच में यह सीरीज कितनी उबाऊ और थका देने वाली होगी। टोटल पेसलेस।

देखनी चाहिए या नहीं?

अगर आप घर पर बिल्कुल ख़लिहर घर बैठे हैं, कोई और काम नहीं है, दुनिया भर की तमाम अच्छे टीवी सीरीज डॉक्युमेंट्रीज या फिल्में निपटा चुके हैं और फिर भी आपके पास वक्त है तब आप इसे देख सकते हैं।

नए कलाकारों और डायरेक्टरों ने बहुत मुश्किल से ओटीटी प्लेटफॉर्म को लोगों के ज़हन में बसाया है। नए लोग, नए कैरेक्टर और नई तरह की कहानियां ओटीटी प्लेटफॉर्म को टीवी और सिनेमा से अलग बनाती है।

लेकिन मेन स्ट्रीम हीरो का ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इस तरीके से आना ना सिर्फ इस प्लेटफार्म को कमजोर करता है बल्कि जिन लोगों ने इस प्लेटफार्म को स्टेबलिश किया है वह उनके मेहनत को भी नुकसान पहुंचाता है।

रंगीले बिहारी की ओर से इस सीरीज को दस में एक तारा. बात खतम.